Wednesday, January 28, 2009

जाति प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, अंबेडकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं


किसी भी सिद्धान्‍त की एकमात्र प्रासंगिकता सामाजिक व्‍यवहार का पथ-प्रदर्शन करने में निहित होती है। किसी भी सामजिक चिन्‍तक का चिन्‍तन वैज्ञानिक और इतिहास-सम्‍मत है या नहीं और वह सामाजिक मुक्ति का यथार्थवादी मार्ग सुझाता है या नहीं - यही सबसे बुनियादी प्रश्‍न है। किसी भी चिन्‍तक या नेता के विचारों को अन्‍धभक्तिपूर्ण भावुकता के बजाय वैज्ञानिक कसौटियों पर परखा जाना चाहिए, उनमें से सही चीज़ों को ग्रहण किया जाना चाहिए और ग़लत चीज़ों की आलोचना करके उनका परित्‍याग किया जाना चाहिए। यह श्रद्धा या अश्रद्धा का प्रश्‍न नहीं है। यह किसी नेता या विचारक की नीयत पर उंगली उठाने का प्रश्‍न भी नहीं है। प्रश्‍न है उनके विचारों की वैज्ञानिकता और व्‍यावहारिकता के आकलन का, जो वस्‍तुपरकता की मांग करता है।
राहुल फाउण्‍डेशन द्वारा प्रकाशित रंगनायकक्म्‍मा की पुस्‍तक 'जाति प्रश्न के समाधान के लिए बुद्ध काफी नहीं, अंबेडकर भी काफी नहीं, मार्क्स जरूरी हैं' इस दृष्टि से अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण है।
क्या अम्‍बेडकर का चिन्‍तन जाति-प्रश्‍न का वैज्ञानिक-ऐतिहासिक विश्‍लेषण और समाधान प्रस्‍तुत करता है? क्‍या अम्‍बेडकर के चिन्‍तन में जाति-प्रश्‍न का कोई अन्तिम समाधान या दलित-मुक्ति की कोई व्‍यवहार्य, यथार्थवादी परियोजना मौजूद है? अम्‍बेडकर ने दलित आन्‍दोलन का जो मार्ग सुझाया था, क्‍या उसकी वही परिणति और नियति होनी थी, जो हुई? जाति-समस्‍या के समाधान के लिए उन्‍होंने अपने अन्तिम दिनों में बौद्ध धर्म की ओर देखा। क्‍या बौद्ध धर्म इस समस्‍या का कोई वास्‍तविक निदान सुझााता है? अम्‍बेडकर ने जाति-प्रश्‍न के समाधान के सन्‍दर्भ में और व्‍यापक सन्‍दर्भों में मार्क्‍सवाद की जो आलोचना प्रस्‍तुत की क्थी, वह कितनी सही थी ? मार्क्‍सवाद का उन्नका अध्‍ययन क्‍या वाक़ई गहन-गम्‍भीर था? रंगनायकम्‍मा की यह पुस्‍तक स्‍पष्‍ट और बेलागलपेट शैली में, अम्‍बेडकर, मार्क्‍स और बौद्ध साहितय के गहन अध्‍ययन के आधार पर वस्‍तुपरक ढंग से, तथ्‍यों, साक्ष्‍यों एवं तर्कों के साथ इन प्रश्‍नों से जूझती है और इनके उत्तर ढूंढ़ती है।

2 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

शायद यह ब्लोग पहले भी देखा हुआ है।
किसी भी चिन्‍तक या नेता के विचारों को अन्‍धभक्तिपूर्ण भावुकता के बजाय वैज्ञानिक कसौटियों पर परखा जाना चाहिए, उनमें से सही चीज़ों को ग्रहण किया जाना चाहिए और ग़लत चीज़ों की आलोचना करके उनका परित्‍याग किया जाना चाहिए। यह श्रद्धा या अश्रद्धा का प्रश्‍न नहीं है।

सोलह आने सही कहा है। और साथ ही ये कहूँगा कि ये वर्ड वेरिफेकेशन हटा दो।

वेद प्रकाश said...

ये किताब बेहद सतही शैली में लिखी गई किताब है. इसमें डॉ. आंबेडकर या बुद्ध का मूल्यांकन करते समय ऐतिहासिक भौतिकवादी पद्धति का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि पहले से तय नतीजों को साबित करने के लिए तर्क जुटाए गए हैं. ये मार्क्सवादी चिंतन की दृष्टि से बहुत चिंताजनक बात है कि जाति जैसी गंभीर समस्या पर लगभग अरुण शौरी की शैली में लिखी गई है और लगभग उन्हीं निष्कर्षों पर पहुँचा गया है जिन पर अरुण शौरी पहुँचे थे. ये किताब यह भी साबित करती है कि मार्क्सवादियों ने मार्क्सवाद को एक वैज्ञानिक पद्धति की बजाय वेदों जैसी पवित्रता प्रदान कर दी है. काश लेखिका ने ये पुस्तक लिखने से पहले राहुल सांकृत्यायन और डॉ. राम विलास शर्मा को पढ़ा होता.

हाल ही में

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