
मक्सिम गोर्की के विराट रचना-संसार के एक बहुत बड़े हिस्से से पूरी दुनिया के पाठक अभी भी अपरिचित हैं। उनके कई महान उपन्यास, उत्कृष्ट कहानियाँ और विचारोत्तेजक निबन्ध अंग्रेज़ी और अन्य यूरोपीय भाषाओं में भी उपलब्ध नहीं हैं। इस मायने में भारतीय भाषाओं और ख़ासकर हिन्दी के पाठक अपने को और भी अधिक वंचित स्थिति में पाते रहे हैं।
‘माँ’, ‘वे तीन’, ‘टूटती कड़ियाँ’, (‘अर्तामानोव्स’ का अनुवाद), ‘मेरा बचपन’, ‘जीवन की राहों पर’, ‘मेरे विश्वविद्यालय’ (आत्म- कथात्मक उपन्यासत्रायी), ‘बेकरी का मालिक’, ‘अभागा’ और ‘फोमा गोर्देयेव’ - गोर्की के कुल ये नौ उपन्यास ही हिन्दी में प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त उनके चार नाटक और चार-पाँच निबन्ध ही सम्भवतः अभी तक हिन्दी में छपे हैं।
जहाँ तक कहानियों का प्रश्न है, ‘इटली की कहानियाँ’ संकलन में शामिल कहानियों के अतिरिक्त, पिछले 60-70 वर्षों के दौरान गोर्की की अन्य लगभग पच्चीस या छब्बीस कहानियाँ ही हिन्दी में छपी हैं और वे भी एक साथ कहीं उपलब्ध नहीं हैं। इन सभी कहानियों को पहली बार काल-क्रम से व्यवस्थित करके, एक साथ, चार खण्डों में प्रस्तुत किया जा रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद जिन चार कहानियों का रचना-काल पता नहीं चल सका, उन्हें तीसरे खण्ड के अन्त में स्थान दिया गया है।
इसी क्रम में आगे परिकल्पना प्रकाशन की योजना गोर्की के अन्य महत्त्वपूर्ण उपन्यासों और निबन्धों के हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित करने की है। इस सिलसिले में पाठकों के सुझावों का पूरे दिल से स्वागत है।
चुनी हुई कहानियाँ, खण्ड 3 में कुल 11 कहानियां संग्रहित हैं। ‘इन्सान पैदा हुआ’, ‘छब्बीस लोग और एक लड़की’, ‘तूफानी पितरेल पक्षी का गीत’ ऐसी कहानियाँ हैं जिनसे हिन्दी पाठक पहले से परिचित हो सकते हैं।
3 comments:
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Aabhaar.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
hey bhut hi accha likha ha tume
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