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Sunday, January 27, 2008

धारा के विरुद्ध तैरना ही होगा...

पूंजीवादी अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो-दूरदर्शन और दर्जनों केबल टीवी चैनलों आदि ने आज पूरे देश के आम लोगों के दिलो-दिमाग पर चौतरफा हमला बोल दिया है। अखबार, छापेखाने, प्रकाशन उद्योग, इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया - इन सब पर हमारे देश के बड़े और मझोले पूंजीपतियों तथा उन्‍हीं की चाकरी बजाने वाली सरकार का शिकंजा तो पहले से कायम था, अब साम्राज्‍यवादी देशों के बड़े-बड़े 'मीडिया दैत्‍यों' ने भी मीडिया तंत्र के अच्‍छे-खासे हिस्‍से पर कब्‍जा जमा लिया है।
एक व्‍यापक सामाजिक परिवर्तन के लिए जन-जन तक नये विचारों और नयी संस्‍कृति को ले जाना आज जितना ही जरूरी है, उतना ही कठिन भी हो गया है। बिना कोई समझौता किये हुए सीमित संसाधनों से निकलने वाली जनपक्षधर पत्र-पत्रिकाओं को अस्तित्‍व के लिए कदम-कदम पर जूझना पड़ रहा है। बड़ी पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्तक सरकार द्वारा विज्ञापन व कागज-कोटा आदि की जो सुविधाएं छोटी पत्र-पत्रिकाओं के नाम पर दी जाती हैं वे ज्‍यादातर ऐसे ही पत्रों को मिलती हैं जो पीत-पत्रकारिता और ब्लैकमे‍लिंग आदि के धंधों में लगे हैं। उसूलों में कोई समझौता किये बगैर जनपक्ष की सच्‍चाइयों को सामने लाने वाले पत्रों से जुड़े पत्रकारों को अभिव्‍यक्ति की आज़ादी का गला फाड़-फाड़कर दुहाई देने वाली यह सरकार तरह-तरह से ''कानूनी'' और गैरकानूनी, दोनों तरीकों से प्रताडि़त करती है और ऐसे पत्रों को बंद कर देने का हर संभव कुचक्र रचती रहती है। सूचना-जगत पर अपनी समाचार एजेंसियों व टीवी चैनलों के जरिए इजारेदारी कायम किये हुए साम्राज्‍यवादी देश भी आज हमारे मस्तिष्‍क को नियंत्रित-निर्देशित करने की हरचंद कोशिशें कर हरे हैं। उन्‍होंने सूचना पर एकाधिकार और सांस्‍कृतिक दुष्‍प्रचार का एक नया दिग्विजय अभियान भी शुरू कर दिया है। नई विश्‍वव्‍यवस्‍था में पूरी दुनिया को ढालने का अभियान पश्चिमी प्रचार तंत्र ने संगठित ढंग से शुरू कर दिया है और हमारे देश के सत्‍ताधारी भी, कुछ आपसी अन्‍तरविरोधों के बावजूद, कुल मिलाकर इस मुहिम में उनके सहयोगी बने हुए हैं। आज हम वही पढ़ते-देखते और सुनते हैं जो साम्राज्‍यवादी-पूंजीवादी लुटेरे और उनकी व्‍यवस्‍था चाहती है। व्‍यापक जनता गैरजानकारी, अधूरी जानकारी और गलत जानकारी की अंधेरी कालकोठरी में कैद कर दी गई है। ऊपर से साम्राज्‍यवाद-पूंजीवाद की निमर्म-निरंकुश लोभ-लाभवादी, उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति के ड्रग्स के विषैली खुराकें देकर पूरे समाज के दिलो-दिमाग को कुंद किया जा रहा है। टी.वी. कार्यक्रमों, कॉमिक्‍स और फिल्‍मों के जरिए आज हमारे समाज के बच्‍चे तक सांस्‍कृतिक प्रदूषण के इस संक्रामक ''मस्तिष्‍क ज्‍वर'' की चपेट में आ चुके हैं। ऐसी स्थिति में आज सभी क्रांतिकारी शक्तियों और जागरूक, प्रगतिशील, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों का एक बुनियादी कर्तव्‍य एवं दायित्‍व बनता है कि वे देश की आम जनता को इस पूरी स्थिति की सही-सच्‍ची जानकारी दें और उसे सहयोग लकर जनपक्षधर पत्र-पत्रिकाओं-पुस्‍तकों के प्रकाशन एंव प्रसार का, तथा नाटक व संगीत से लेकर वीडियो फिल्‍मों तक -विविध कला माध्‍यों के प्रयोग का एक व्‍यापक ताना-बाना खड़ा करें। इनके माध्‍यम से से आज विचार एवं संस्‍कृति के मोर्चे पर एक सर्वथा नये, क्रान्तिकारी नवजागरण एवं क्रान्तिकारी प्रबोधन की अलख जगाने की जरूरत है। सत्‍ता पक्ष इस व्‍यवस्‍था की हिफाजत में अपने सूचनातंत्र का आज सूक्ष्‍मतम, व्‍यापकतम और कुशलतम इस्‍तेमाल कर रहा है अब जनपक्ष को भी व्‍यवस्‍था परिवर्तन की लड़ाई में सूचना को हथियार बनाना होगा।
इन्‍हीं उद्देश्‍यों को सामने रखकर राहुल फाउण्‍डेशन प्रकाशन प्रभाग तथा इसके सहयोगी प्रकाशन 'परिकल्‍पना' द्वारा अनेक महत्‍वपूर्ण साहित्यिक व राजनीतिक पुस्‍तकों का प्रकाशन जारी है। हर प्रकार के जनपक्षधर, प्रगतिशील व क्रान्तिकारी साहित्‍य के मुद्रण में सहयोग के लिए राहुल फाउण्‍डेशन का कम्‍प्‍यूटर प्रभाग कई वर्षों से काम कर रहा है। ऐसे साहित्‍य तथा कविता पोस्‍टरों, स्टिकर्स, कैसेटों आदि प्रचार सामग्री के वितरण के लिए इसकी सहयोगी संस्‍था 'जनचेतना' के तहत विगत 21 वर्षों से गोरखपुर व लखनऊ में नियमित विक्रय केंद्र चलाये जाने के अतिरिक्‍त अनेक शहरों-कस्‍बों में साहित्‍य प्रदर्शनियां आयोजित करने एवं घर-घर साहित्‍य पहुंचाने की योजनाएं चलाई जा रही हैं। यह एक लम्‍बी यात्रा की छोटी-सी शुरुआत है। पर पूरे देश में एक नये सांस्‍कृतिक आन्‍दोलन और जनता के क्रांतिकारी मीडिया की निर्माण-प्रक्रिया यहीं से शुरू होगी। हमें मात्र आपकी सहानुभूति ही नहीं, बल्कि सार्थक सहयोग और सक्रिय सहभागिता की जरूरत है।

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